सीआरपीसी के सेक्शन 41 के तहत पुलिस अधिकारी मजिस्ट्रेट ऑर्डर या वारंट के बिना किसी व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकता है। या यू कहें बिना सूचना दिए पुलिसी किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकती है। इस सेक्शन तहत उन लोगों को गिरफ्तार किया जा सकता है जिनके खिलाफ संज्ञेय अपराध की शिकायत हो। या ऐसे लोगों को भी गिरफ्तार किया जा सकता है जिन पर उन धाराओं के तहत शिकायत दर्ज की गई हो जिसमें सात साल की सजा का प्रावधान हो।
आइए जानते हैं सेक्शन 41 A के क्या प्रावधान हैं? सेक्शन 41 के विपरीत सेक्शन 41 A में किसी को अरेस्ट करने से पहले नोटिस दिए जाने का प्रावधान है। यानी बिना सूचना दिए किसी को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है। इसमें सात साल से कम की सजा वाले मामले आते हैं। पुलिस जिसे नोटिस भेजे, उस व्यक्ति का कर्तव्य है कि वो नोटिस में कही गई बातों का पालन करे। अगर व्यक्ति नोटिस के निर्देशों का पालन करता है और वो पुलिस के सामने हाजिर होता है तो पुलिस उसे गिरफ्तार नहीं करेगी। हालांकि, अगर पुलिस को लगे कि उसे गिरफ्तार करना जरूरी है तो वो लिखित में अपनी दलीलें देकर व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकती है। अगर व्यक्ति पुलिस के सामने हाजिर नहीं होता है तो पुलिस उसे अरेस्ट कर सकती है. लेकिन इसके लिए पुलिस को कोर्ट से उस व्यक्ति के खिलाफ अरेस्ट वांरट जारी करवाना होगा।
सी.आर.पी.सी. की धारा 41A को अपराधिक प्रक्रिया संहिता (संशोधन) अधिनियम, 2008 (2009 का 5) द्वारा जोड़ा गया था। हालाँकि, हाल ही में इस संशोधन के अधिनियमित होने के बाद, केंद्र सरकार द्वारा अभ्यावेदन (रिप्रेजेंटेशन) प्राप्त किए गए थे। इस प्रकार, अपराधिक प्रक्रिया संहिता (संशोधन) अधिनियम, 2010 (2010 का 41) द्वारा कुछ विशिष्ट संशोधन लाए गए थे। इस धारा के तहत एक व्यक्ति को एक पुलिस अधिकारी के सामने पेश होने के नोटिस के बारे में बात की गई है। यह धारा निम्नलिखित बताती है:
- पुलिस अधिकारी को, किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसके खिलाफ उचित शिकायत की गई है या विश्वसनीय जानकारी प्राप्त हुई है, या एक उचित संदेह मौजूद है कि उन्होंने एक संज्ञेय अपराध किया है, को उनके सामने या ऐसे अन्य स्थान पर जैसा कि उस नोटिस के द्वारा निर्दिष्ट किया जा सकता है, और उनको पेश होने के लिए आदेश देने के लिए एक नोटिस जारी करना चाहिए, उन सभी परिस्थितियों में जहां धारा 41(1) की शर्तों के तहत किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी की आवश्यकता नहीं है।
- नोटिस के प्रावधानों का पालन करना, यह उस व्यक्ति की जिम्मेदारी है जिसे नोटिस जारी किया गया है।
- यदि व्यक्ति नोटिस प्राप्त करता है और उसका अनुपालन (कॉम्प्लाई) करता है, तो उसे नोटिस में उल्लिखित अपराध के लिए तब तक गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है, जब तक कि पुलिस अधिकारियों को यह विश्वास न हो कि उसे उन कारणों, जिन्हें दर्ज किया जाएगा, से हिरासत में लिया जाना चाहिए।
- किसी सक्षम न्यायालय द्वारा इस संबंध में जारी किए गए किसी भी आदेश के अधीन, पुलिस अधिकारी किसी भी समय नोटिस में निर्दिष्ट अपराध के लिए गिरफ्तारी कर सकता है, यदि प्रश्नगत व्यक्ति नोटिस के प्रावधानों का पालन करने से इनकार करता है, या फिर वह खुद को पहचानने से इंकार कर देता है।
सी.आर.पी.सी. के तहत गिरफ्तारी क्या है
शब्द “गिरफ्तारी” को ना तो अपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 और न ही भारतीय दंड संहिता, 1860 (आई.पी.सी.) के तहत परिभाषित किया गया है। हालाँकि, डिक्शनरी की परिभाषा के अनुसार, गिरफ्तारी किसी व्यक्ति को, किसी कानूनी प्राधिकरण (अथॉरिटी) द्वारा हिरासत में लेने या रखने का संदर्भ देती है, और यह विशेष रूप से एक आपराधिक आरोप के आधार पर होता है। दूसरे शब्दों में, कानूनी प्राधिकरण द्वारा एक व्यक्ति को उसकी शारीरिक स्वतंत्रता से वंचित करने को एक गिरफ्तारी के रूप में माना जाता है।
इसके अलावा, कई भारतीय अदालतों ने “गिरफ्तारी” शब्द को परिभाषित करने का प्रयास किया है, जैसे कि आर.आर चारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1951) के मामले में, न्यायालय के द्वारा “गिरफ्तारी” शब्द को आधिकारिक तौर पर किसी अपराध का आरोप लगाने के लिए हिरासत में लिए जाने के कार्य के रूप में माना गया था। अदालत ने यह भी माना कि गिरफ्तारी में एक व्यक्ति की जब्ती भी शामिल है।
जबकि, पंजाब राज्य बनाम अजैब सिंह (1995) के मामले में, अदालत के द्वारा यह माना गया था की एक अपहृत (एब्डक्टेड) व्यक्ति पर शारीरिक संयम का इस्तेमाल करना, जब उन्हें मुक्त किया जा रहा है, और फिर उन्हें हिरासत में ले जाना, और फिर किसी आपराधिक या अर्ध-आपराधिक प्रकृति के किसी भी अपराध या राज्य या राज्य के लोगों के लिए हानिकारक किसी भी कार्य के किसी भी वास्तविक या संदिग्ध (सस्पेक्टेड) या पकड़े गए कार्य के तहत लगाए गए किसी भी आरोप या दोषारोपण (एक्यूसेशन) के बिना, निकटतम शिविर (कैंप) के प्रभारी (इन चार्ज) अधिकारी की हिरासत में वितरित करना, और इस तरह से अपहृत व्यक्ति (वसूली और बहाली) अधिनियम, 1949 की धारा 4 के अनुसार ऐसे व्यक्ति को निकटतम शिविर के कमांड में अधिकारी की हिरासत में पहुंचाना, भारत के संविधान के अनुच्छेद 22(1) और 22 (2) के तहत गिरफ्तारी या हिरासत का गठन नहीं करता है।
































